Constitutional 

संविधानवादसंविधानवाद (Constitutionalism) का सामान्य अर्थ यह विचार है कि सरकार की सत्ता संविधान से उत्पन्न होती है तथा इसी से उसकी सीमा भी तय होती है।[1]

संयुक्त राज्य के संविधान पर हस्ताक्षर के समय का दृष्य (१९४० में निर्मित चित्र)

संविधानवाद सरकार के उस स्वरूप को कहते हैं जिसमें संविधान की प्रमुख भूमिका होती है। अधिकारियों को मनमाने निर्णय की छूट होने के स्थान पर ‘कानून के राज्य’ का पक्ष लेना ही संविधानवाद है। संविधानवाद की मूल भावना यह है कि सरकारी अधिकारी कुछ भी, और किसी भी तरीके से, करने के लिये स्वतंत्र नहीं हैं बल्कि उन्हें अपनी शक्ति की सीमाओं के अन्दर रहते हुए ही कार्य करने की आजादी (या बन्धन) है और वह भी संविधान में वर्णित प्रक्रिया (procedures) के अनुसार।
ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप ही संविधानिक राज्यों का जन्म हुआ। मनुष्य द्वारा राजसत्ता के अत्याचार व दुरूपयोग के बचने के प्रयास के परिणाम स्वरूप संविधानवाद का जन्म हुआ। आधुनिक संविधानवाद के विस्तृत आधार हैं, किन्तु इसका मूल आधार ‘‘विधि का शासन’’ ही माना जाता है। प्राचीन काल से ही ऐसे विविध विचारो पर चिन्तन किया जाता रहा हैं जो राजसत्ता को प्रभावी ढ़ंग से नियंत्रित कर सके एवं उसके सद्-प्रयोग में सहायक बन सके। इस दृष्टिकोण से प्राचीनकाल से ही राजसत्ता एवं नैतिक अभिबन्धनों एवं धार्मिक मान्यताओं के साथ ही शाश्वत विधि, प्राकृतिक विधि, दैवीय विधि एवं मानवीय विधि के रूप में विभिन्न उपायों पर विचार करने की लम्बी परम्परा दीख पड़ती हैं।
परिचय

संविधानवाद ब्रिटिश उपनिवेशवाद की देन है। अंग्रेज़ों ने इसके ज़रिये एक तीर से तीन निशाने लगाने की कोशिश की। उनका पहला मकसद यह था कि संविधानवाद के माध्यम से उनके उपनिवेश धीरे-धीरे स्व-शासन की तरफ़ बढ़ें और वि-उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके। उनका दूसरा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि स्व-शासन हासिल कर लेने के बाद भी यानी स्वतंत्र हो जाने के बावजूद उपनिवेशित राज्य उनके प्रभाव के दायरे में रहें। स्व-शासन के संविधानवादी रास्ते को इसी लिहाज़ से डिज़ाइन किया गया था। संविधानवाद से अंग्रेज़ों ने एक तीसरा और पेचीदा मकसद हासिल करने की कोशिश भी की। वे अपने उदारतावाद, संसदीय लोकतंत्र, मुक्त बाज़ार और व्यक्ति-स्वातंत्र्य के आग्रहों का तालमेल उपनिवेशवाद के सैनिक, सामाजिक और आर्थिक यथार्थ से करना चाहते थे।
दरअसल, युरोप की उपनिवेशवादी ताकतों का साम्राज्यवादी दर्शन एक सा नहीं था। इसी के परिणामस्वरूप उपनिवेशीकरण और अ-उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया के प्रति वे अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाते थे। दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी भी समकालीन युरोपीय उपनिवेशवादियों से कम नस्लवादी और दमनकारी नहीं थे। पर, उन्होंने आयरलैण्ड को छोड़कर अपने अन्य उपनिवेशों में सत्ता के क्रमिक हस्तांतरण और अप्रत्यक्ष  शासन की नीति अपनायी। महारानी विक्टोरिया का शासन पैक्स ब्रिटानिका की नीति पर चलता था जिसके मुताबिक ब्रिटिश हुकूमत स्थानीय रीति-रिवाज़ों और राजनीति में हस्तक्षेप करने से आम तौर पर परहेज़ करती थी। उसका जोर व्यापार, विदेश नीति और प्रतिरक्षा को अपने नियंत्रण में रखने पर रहता था। इसी के मुताबिक उन्होंने गवर्नर द्वारा नियंत्रित किये जाने वाले उपनिवेशों में भी उसे सलाह देने के लिए अधिकारियों की एक कार्यकारी परिषद् नियुक्त कर रखी थी। आगे चल कर उन्होंने विधान परिषदों का निर्वाचन भी करवाया ताकि बनाये गये कानून उपनिवेशित जनता को अपने प्रतिनिधियों द्वारा बनाये गये प्रतीत हों। अंग्रेज़ों के मुकाबले फ़्रांसीसियों का ज़ोर अपने उपनिवेशों के फ़्रांसीसी राष्ट्र में सम्पूर्ण आत्मसातीकरण पर रहता था।
ब्रिटिश राजनीतिज्ञ ऐडमण्ड बर्क का कहना था कि अगर कानूनों को देशज जनता के जीनियस, प्रकृति और मानस के मुताबिक बनाया जाए तो औपनिवेशिक शासन सर्वाधिक प्रभावी साबित होता है। इसी सिद्धांत के मुताबिक एक के बाद एक ब्रिटिश सरकारों ने उपनिवेशों में बढ़ रहे राजनीतिक असंतोष का दमन तो किया ही, पर साथ ही राजनीतिक और संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया भी चलाई। इस नीति के पीछे उन्नीसवीं सदी का वह तजरुबा था जो अंग्रेज़ उपनिवेशवादियों ने अमेरिका, न्यूज़ीलैण्ड और ऑस्ट्रेलिया में स्थापित उपनिवेशों से हासिल किया था। इन उपनिवेशों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के कुछ ऐसे रूप विकसित किये गये थे जिनके तहत वहाँ के अधिवासियों को लगता था कि उन्हें इंग्लैण्ड की नागरिकता भी प्राप्त है। इसी के आधार पर अंग्रेज़ों ने नीति बनायी कि राष्ट्रवादी आंदोलनों को संविधानसम्मत राजनीति करते हुए स्व-शासन की तरफ़ जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। वहाँ की जनता को धीरे-धीरे विधायी अधिकार दिये जाएँ। पहले वे भीतरी शासन की ज़िम्मेदारी सँभालें और फिर बाद में विदेश नीति का नियंत्रण भी उनके हाथ में दे दिया जाए। अंग्रेज़ लगातार इस शब्दाडम्बर का प्रयोग करते रहे कि अपने औपनिवेशिक मिशन के ज़रिये वे एशिया और अफ़्रीका के ‘पिछड़े’ समाजों को संसदीय लोकतंत्र और उत्तरदायी शासन की विवेकपूर्ण ब्रिटिश परम्पराओं से सम्पन्न करना चाहते हैं।
दरअसल, उपनिवेशों को अपने हाथ में रखना उत्तरोत्तर मुश्किल होता जा रहा था। इसलिए ब्रिटेन ने लचीला और परिणामवादी रवैया अख्तियार करते हुए अपनी सत्ता और प्रभाव को सुरक्षित करने के लिए संवैधानिक सुधारों का रास्ता अपनाया। संविधानवाद की नीति इस मान्यता पर आधारित थी कि किसी साम्राज्य को कायम रखने के लिए फ़ौजी दमन और जबरिया कब्ज़ा करने की नीति अब प्रभावी नहीं रह गयी है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तो यह हकीकत और भी साफ़ हो गयी। ब्रिटिश नीति-निर्माताओं को यकीन हो गया कि अ-उपनिवेशीकरण की चाल को केवल संवैधानिक सुधारों के माध्यम से ही नियंत्रित किया जा सकता है। केवल इसी तरह से ब्रिटिश सरकार नये बनने वाले स्वतंत्र और सम्प्रभु राष्ट्रों के साथ घनिष्ठ आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक रिश्ते बनाये रख सकता था।
उपनिवेशवादियों की कोशिश रहती थी कि वे उपनिवेशित जनता को केंद्रीकृत और एकीकृत प्रशासन के तहत लाएँ ताकि उनका आर्थिक दोहन ज़्यादा से ज़्यादा किया जा सके। इसकी प्रतिक्रिया में राष्ट्रवाद आर्थिक तर्क ले कर टकराव की मुद्रा में सामने आता था। अंग्रेज़ होशियारी से राष्ट्रवादियों के बीच से उदार और नरम तत्त्वों को चुनते थे और स्थानीय नीतियाँ इस प्रकार बनाते थे कि उन्हीं तत्त्वों का बोलबाला राष्ट्रीय आंदोलन पर कायम हो जाए।  उग्र राष्ट्रवादियों का दमन करने और नरम राष्ट्रवादियों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ उनकी दूसरी नीति सामाजिक रूप से परम्परानिष्ठ और अनुदार अभिजनों के साथ गठजोड़ कर लेने की होती थी। समझा जाता है कि उनके इस संविधानवाद का सबसे कामयाब प्रयोग सीलोन (श्रीलंका) में हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अपने इस उपनिवेश के सामरिक महत्त्व देख कर अंग्रेज़ श्रीलंका को डोमीनियन या स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा देने के लिए तैयार हो गये। बदले में उन्होंने सीलोन के साथ प्रतिरक्षा और विदेश नीति के मामले में सहयोग सुनिश्चित कर लिया। श्रीलंकाई समाज सिंहली बहुसंख्या और तमिल और मुसलमान अल्पसंख्या में बँटा हुआ था। अंग्रेज़ों ने सामाजिक रूप से अनुदारवादी सिंहली प्रभुओं के साथ गठजोड़ स्थापित किया। इसी तरह मलाया को 1957 में आज़ादी देने के बदले अंग्रेज़ों ने राष्ट्रमण्डलीय व्यापार और प्रतिरक्षा प्रणाली में मलय भागीदारी को सुनिश्चित किया। 1945 के बाद ही अंग्रेज़ों ने मलाया के अनुदारपंथी परम्परागत शासकों के साथ गठजोड़ करके एक केंद्रीकृत प्रशासन खड़ा कर लिया था। इसी के तहत 1954 में चुनाव कराये गये और अंग्रेज़ों के मन की पार्टी जीत गयी। अंग्रेज़ों ने सत्ता हस्तातंरण उसी के हाथ में किया।
संविधानवाद की यह नीति हर जगह अंग्रेज़ों की मर्जी के मुताबिक नहीं चली। उन्होंने भारत में भी संवैधानिक सुधारों की लम्बी प्रक्रिया चलाई, पर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान और बाद में कांग्रेस के नेतृत्व में चली ब्रिटिश विरोधी मुहिम ने उनके इरादों को नाकाम कर दिया। कांग्रेस और मुसलिम लीग के बीच ख़राब होते संबंधों ने भी अंग्रेज़ों की दाल नहीं गलने दी। हालाँकि इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि राष्ट्रवादी आंदोलन की बागडोर गरमपंथियों के हाथों में जाने से रोकने के लिए अंग्रेज़ों ने नरमपंथियों की तरफ़दारी वाला रुख हमेशा अपनाये रखा। कुछ प्रेक्षक राष्ट्रीय आंदोलन के कुछ नेताओं की चमकदार छवि बनाने के पीछे ब्रिटिश शासन के इरादे और योजना को भी देखते हैं।
इसी तरह पश्चिम अफ़्रीकी उपनिवेश गोल्ड कोस्ट में अंग्रेज़ों का संविधानवाद वांछित नतीजे नहीं दे पाया। 1950 के नये संविधान के तहत नक्रूमा की पार्टी ने क्रमशः के बजाय तेज़ी से संवैधानिक सुधार करने के लिए मजबूर कर दिया। सार्विक मताधिकार घोषित होने के बाद हुए चुनावों में नक्रूमा की पार्टी ने ज़ोरदार जीत हासिल की और अंग्रेज़ों की इच्छित राजनीतिक ताकतें हार गयीं।  उपनिवेशवादियों को मजबूरन नक्रूमा को सत्तारूढ़ होने के लिए जेल से रिहा करना पड़ा। 1957 में गोल्ड कोस्ट घाना गणराज्य में बदल गया। कुछ ऐसे उपनिवेश भी थे जहाँ अंग्रेज़ों ने संविधानवाद की नीति नहीं अपनायी और दमन का रवैया जारी रखा। केन्या का उदाहरण बताता है कि वहाँ की परिस्थितियों में अंग्रेज़ों ने उदीयमान अफ़्रीकी राष्ट्रवाद की शक्तियों को उग्र और अशांतिकारी कह तक ख़ारिज कर दिया। उनकी कोशिश थी कि एक बहुनस्ली संविधान पारित करवा लिया जाए ताकि श्वेत अल्पसंख्यकों का रंग-रुतबा कायम रखा जा सके। उन्होंने केन्या के सबसे बड़े कबीले किकायू की माँगे ठुकरा दीं। संवैधानिक रियायतें न देने के कारण अंग्रेज़ों ने राष्ट्रवादियों के बीच उग्रपंथियों के लिए रास्ता साफ़ कर दिया।
इन्हें भी देखें

विधि का शासन

अधिकार

अराजकतावाद

सन्दर्भ

↑ [Don E. Fehrenbacher, Constitutions and Constitutionalism in the Slaveholding South (University of Georgia Press, 1989) at p. 1. ISBN 978-0-8203-1119-7.]

1. जी.डी. बॉयस (1999), डिकोलोनाइज़ेशन ऐंड द ब्रिटिश एम्पायर, 1775-1997, मैकमिलन, लंदन.
2. एम. चैम्बरलेन (1998), युरोपियन डिकोलोनाइज़ेशन इन ट्वेंटियथ सेचुरी, लोंगमेन, लंदन और न्यूयॉर्क.

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