Bharti. Congress party

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसयह भारत का एक राजनैतिक दल है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, अधिकतर कांग्रेस के नाम से प्रख्यात, भारत के दो प्रमुख राजनैतिक दलों में से एक हैं, जिन में अन्य भारतीय जनता पार्टी हैं। कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश राज में १८८५ में हुई थी;[5] इसके संस्थापकों में ए ओ ह्यूम (थियिसोफिकल सोसाइटी के प्रमुख सदस्य), दादा भाई नौरोजी और दिनशा वाचा शामिल थे।[6] १९वी सदी के आखिर में और शुरूआती से लेकर मध्य २०वी सदी में, कांग्रेस भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में, अपने १.५ करोड़ से अधिक सदस्यों और ७ करोड़ से अधिक प्रतिभागियों के साथ, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरोध में एक केन्द्रीय भागीदार बनी।
इसके और भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस (संगठन) के मध्य भ्रमित न हो।

सामान्य तथ्य: भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस, दल अध्यक्ष …

१९४७ में आजादी के बाद, कांग्रेस भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी बन गई। आज़ादी से लेकर २०१६ तक, १६ आम चुनावों में से, कांग्रेस ने ६ में पूर्ण बहुमत जीता हैं और ४ में सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व किया; अतः, कुल ४९ वर्षों तक वह केन्द्र सरकार का हिस्सा रही। भारत में, कांग्रेस के सात प्रधानमंत्री रह चुके हैं; पहले जवाहरलाल नेहरू (१९४७-१९६५) थे और हाल ही में मनमोहन सिंह (२००४-२०१४) थे। २०१४ के आम चुनाव में, कांग्रेस ने आज़ादी से अब तक का सबसे ख़राब आम चुनावी प्रदर्शन किया और ५४३ सदस्यीय लोक सभा में केवल ४४ सीट जीती।
इतिहास

मुख्य लेख : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास दो विभिन्न काल से गुज़रता हैं।
आज़ादी से पूर्व – जब यह पार्टी स्वतंत्रता अभियान की संयुक्त संगठन थी।

आज़ादी के बाद – जब यह पार्टी भारतीय राजनीति में प्रमुख स्थान पर विद्यमान रही हैं।

स्वतन्त्रता संग्राम

मुख्य लेख : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

स्थापना

काँग्रेस की स्थापना के समय सन् 1885 का चित्र

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति के साथ 28 दिसम्बर 1885 को बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी। इसके संस्थापक महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) ए ओ ह्यूम थे जिन्होंने कलकत्ते के व्योमेश चन्द्र बनर्जी को अध्यक्ष नियुक्त किया था। अपने शुरुआती दिनों में काँग्रेस का दृष्टिकोण एक कुलीन वर्ग की संस्था का था। इसके शुरुआती सदस्य मुख्य रूप से बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी से लिये गये थे। काँग्रेस में स्वराज का लक्ष्य सबसे पहले बाल गंगाधर तिलक ने अपनाया था।[7]
प्रारम्भिक वर्ष
1907 में काँग्रेस में दो दल बन चुके थे – गरम दल एवं नरम दल। गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं बिपिन चंद्र पाल (जिन्हें लाल-बाल-पाल भी कहा जाता है) कर रहे थे। नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता एवं दादा भाई नौरोजी कर रहे थे। गरम दल पूर्ण स्वराज की माँग कर रहा था परन्तु नरम दल ब्रिटिश राज में स्वशासन चाहता था। प्रथम विश्व युद्ध के छिड़ने के बाद सन् 1916 की लखनऊ बैठक में दोनों दल फिर एक हो गये और होम रूल आंदोलन की शुरुआत हुई जिसके तहत ब्रिटिश राज में भारत के लिये अधिराजकिय पद(अर्थात डोमिनियन स्टेटस) की माँग की गयी।
कांग्रेस एक जन आंदोलन के रूप में
परन्तु 1915 में गाँधी जी के भारत आगमन के साथ काँग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव आया। चम्पारन एवं खेड़ा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन समर्थन से अपनी पहली सफलता मिली। 1919 में जालियाँवाला बाग हत्याकांड के पश्चात गान्धी काँग्रेस के महासचिव बने। उनके मार्गदर्शन में काँग्रेस कुलीन वर्गीय संस्था से बदलकर एक जनसमुदाय संस्था बन गयी। तत्पश्चात् राष्ट्रीय नेताओं की एक नयी पीढ़ी आयी जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई एवं सुभाष चंद्र बोस आदि शामिल थे। गान्धी के नेतृत्व में प्रदेश काँग्रेस कमेटियों का निर्माण हुआ, काँग्रेस में सभी पदों के लिये चुनाव की शुरुआत हुई एवं कार्यवाहियों के लिये भारतीय भाषाओं का प्रयोग शुरू हुआ। काँग्रेस ने कई प्रान्तों में सामाजिक समस्याओं को हटाने के प्रयत्न किये जिनमें छुआछूत, पर्दाप्रथा एवं मद्यपान आदि शामिल थे।[8]
स्वतन्त्र भारत

1947 में भारत की स्वतन्त्रता के बाद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के मुख्य राजनैतिक दलों में से एक रही है। इस दल के कई प्रमुख नेता भारत के प्रधानमन्त्री रह चुके हैं। जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, नेहरू की पुत्री इन्दिरा गान्धी एवं उनके नाती राजीव गान्धी इसी दल से थे। राजीव गांधी के बाद सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बने जिन्हे सोनिया गांधी के समर्थकों ने निकाला तथा सोनिया को हाईकमान बनाया, अब राजीव गान्धी की पत्नी सोनिया गान्धी कांग्रेस की अध्यक्ष होने के साथ यूपीए की चेयरपर्सन भी हैं। उनके सरकार में मणिशंकर अय्यर, कपिल सिब्बल तथा काँग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल और राशिद अल्वी, राज बब्बर, राहुल गांधी, मनीष तिवारी भी है। पूर्व भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ॰ मनमोहन सिंह भी इसी दल से ताल्लुक रखते हैं।
नेहरू/शास्त्री युग
इंदिरा युग
राजीव गांधी और राव युग
आधुनिक युग
अवधारणाएँ और नीतियाँ

कांग्रेस एक नागरिक राष्ट्रवादी पार्टी हैं, जो एक प्रकार के राष्ट्रवाद का अनुसरण करती हैं, जो आज़ादी, सहिष्णुता, समानता और वैयक्तिक अधिकारों जैसे मूल्यों का समर्थन करता हैं।[9]
आर्थिक नीति

स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा

सुरक्षा और गुह मामले

विदेश नीति

काँग्रेस की नीतियों का विरोध

समय-समय पर विभिन्न नेताओ ने काँग्रेस की नीतियों का विरोध किया और उसे हटाने के लिये संघर्ष किया। इनमें राममनोहर लोहिया का नाम अग्रणी है जो जवाहरलाल नेहरू के कट्टर विरोधी थे। इसके अलावा जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंका। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स दलाली काण्ड को लेकर राजीव गांधी को सत्ता से हटा दिया।
लोहिया का ‘काँग्रेस हटाओ’ आन्दोलन

संयुक्त विधायक दल भी देखें
राम मनोहर लोहिया लोगों को आगाह करते आ रहे थे कि देश की हालत को सुधारने में काँग्रेस नाकाम रही है। काँग्रेस शासन नये समाज की रचना में सबसे बड़ा रोड़ा है। उसका सत्ता में बने रहना देश के लिये हितकर नहीं है। इसलिये लोहिया ने नारा दिया – “काँग्रेस हटाओ, देश बचाओ।”
1967 के आम चुनाव में एक बड़ा परिवर्तन हुआ। देश के 9 राज्यों – पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में गैर काँग्रेसी सरकारें गठित हो गयीं। लोहिया इस परिवर्तन के प्रणेता और सूत्रधार बने।
जेपी आन्दोलन

मुख्य लेख : सम्पूर्ण क्रांति

सन् 1974 में जयप्रकाश नारायण ने इन्दिरा गान्धी की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिये सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा दिया। आन्दोलन को भारी जनसमर्थन मिला। इससे निपटने के लिये इन्दिरा गान्धी ने देश में इमर्जेंसी लगा दी। सभी विरोधी नेता जेलों में ठूँस दिये गये। इसका आम जनता में जमकर विरोध हुआ। जनता पार्टी की स्थापना हुई और सन् 1977 में काँग्रेस पार्टी बुरी तरह हारी। पुराने काँग्रेसी नेता मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी किन्तु चौधरी चरण सिंह की महत्वाकांक्षा के कारण वह सरकार अधिक दिनों तक न चल सकी।
भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन

मुख्य लेख : बोफोर्स घोटाला

सन् 1987 में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कम्पनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में काँग्रेस की सरकार थी और उसके प्रधानमन्त्री राजीव गान्धी थे। स्वीडन रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स काण्ड के नाम से जाना जाता हैं। इस खुलासे के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन चलाया जिसके परिणाम स्वरूप विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधान मन्त्री बने।
कांग्रेस-मुक्त भारत

सोलहवीं लोकसभा के चुनावों के समय नरेन्द्र मोदी ने ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ का नारा दिया जो काफी प्रभावी रहा। चुनावों में कांग्रेस की सीटें मात्र ४४ पर आकर सिमट गयीं, जिसे विपक्षी दल का दर्जा भी प्राप्त नहीं हुआ –
विपक्ष के नेता

मल्लिकार्जुन खड़गे – लोकसभा

गुलाम नबी आजाद – राज्यसभा

इन्हें भी देखें

भारतीय जनता पार्टी

आम आदमी पार्टी

सन्दर्भ

↑ “India General (Lok Sabha) Election 2014 Results”. mapsofindia.com.

↑ “Election Results India, General Elections Results, Lok Sabha Polls Results India – IBNLive”. in.com.

↑ “All India 2014 Results – Partywise – Political Baba”. politicalbaba.com.

↑ “Lok Sabha Election 2014 Analysis, Infographics, Election 2014 Map, Election 2014 Charts – Firstpost Description”. firstpost.com.

↑ क्रान्त, मदनलाल वर्मा (2006) (Hindi में) स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास 1 (1 सं॰) नई दिल्ली: प्रवीण प्रकाशन प॰ 13 आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7783-119-4 . अभिगमन तिथि: 11 जनवरी 2014 “काँग्रेस की स्थापना से पूर्व देश में कुछ ऐसे तत्व विद्यमान थे जो यह सोचते थे कि जब अंग्रेजों को ही यहाँ शासन करना है तो फिर क्यों न उनसे मित्रता बनाकर और उनकी ‘प्रशस्ति-स्तुति’ या ‘जी हुजूरी’ करके अपने लिये कुछ विशेष अधिकार प्राप्त किये जायें। इन्हीं तत्वों ने मिलकर राजनीतिक पृष्ठभूमि को इस योग्य बनाया जिस पर विदेशी भावभूमि से आयातित काँग्रेस का संकर बीज बोया जा सका।”

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